सामाजिक विचारक सुरेश कोठारी बोले पर्यूषण पर्व का अंतिम दिन संवत्सरी: क्षमा और आत्मचिंतन से रिश्तों को सहेजने का पर्व

संवत्सरी का यह संदेश जैन समाज तक सीमित न रहकर संपूर्ण समाज के लिए प्रासंगिक है। हर रिश्ते में खुद को सही साबित करने के बजाय झुकना और क्षमा करना ही मन की शांति और करुणा का सच्चा मार्ग है। दुर्ग। जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी को केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और रिश्तों को मजबूती देने का अवसर माना जाता है। इस दिन लोग वर्ष भर में मन, वचन और कर्म से जाने-अनजाने किसी को भी पहुंचाई गई पीड़ा के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा याचना ('मिच्छामि दुक्कड़म्') करते हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) सुरेश कोठारी ने संवत्सरी के संदेश पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अहं और गलतफहमियों के कारण अक्सर रिश्तों में दूरियां आ जाती हैं। ऐसे में क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल और रिश्तों को प्राथमिकता देने का परिचय है। उन्होंने मुख्य बिंदु सामने रखे: * सच्ची भावना महत्वपूर्ण: मोबाइल या सोशल मीडिया पर केवल औपचारिक संदेश भेजने के बजाय दिल से संवाद कायम कर गलतफहमियां दूर करना आवश्यक है। * क्षमा करने का बड़ा मन: दूसरों को क्षमा करके ही मन को कटुता और अतीत के बोझ से मुक्त किया जा सकता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है। * व्यापक संदेश: यह पर्व केवल निकट संबंधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर जीव के प्रति संवेदनशीलता और विनम्रता सिखाता है। संवत्सरी का यह संदेश जैन समाज तक सीमित न रहकर संपूर्ण समाज के लिए प्रासंगिक है। हर रिश्ते में खुद को सही साबित करने के बजाय झुकना और क्षमा करना ही मन की शांति और करुणा का सच्चा मार्ग है।

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