Durg शहर में आवारा कुत्ते सैकड़ों को काट चूके हैं दहशत में है मासूम बच्चे बुजुर्ग व महिलाऐं पशु प्रेमी,मानवता के चलते खाना भी खिलाते हैं इन्हें

अंतरास्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, बैटमिनटन कोर्ट और स्विमिंग पूल सब बन रहा है किंतु यह एक बेहद गंभीर और जमीनी हकीकत को उजागर करने वाला विषय है। जब सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश सामने आ चुके हैं, ऐसे में बुनियादी ढांचे (डॉग हाउस/आश्रय स्थल) का न होना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। ​इस तीखे और यथार्थवादी मुद्दे पर ​सुप्रीम कोर्ट का फरमान बनाम दुर्ग निगम की बदहाली नई शहर सरकार के कार्यकाल को सवा साल से ज्यादा हो गया पर दुर्ग शहर में एक 'डॉग हाउस' तक नहीं ​विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: दुर्ग (छत्तीसगढ़) ​एक तरफ देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने साफ कर दिया है कि आवारा कुत्तों के आतंक से मुक्त होकर जीना इंसानों का मौलिक अधिकार है और पकड़े गए कुत्तों को सड़कों पर छोड़ने के बजाय शेल्टर होम में रखना होगा। लेकिन छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण नगर निगमों में से एक—दुर्ग नगर निगम में इस ऐतिहासिक आदेश का पालन होना फिलहाल नामुमकिन नजर आ रहा है।​सच्चाई यह है कि दुर्ग नगर निगम के पास आज की तारीख में आवारा कुत्तों को रखने के लिए एक अदद डॉग हाउस (एनिमल शेल्टर) तक नहीं है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नई शहर सरकार को नगर निगम की कमान संभाले एक साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन बुनियादी ढांचे में बहुत कमी है।​कागजों पर दावों की बौछार, जमीन पर 'शून्य' बुनियादी ढांचा ​दुर्ग शहर के हर वार्ड, गली और मोहल्ले में आवारा कुत्तों का जमावड़ा है। बच्चों का शाम को घर से निकलना और बुजुर्गों का सुबह की सैर पर जाना दूभर हो चुका है। जब सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन जारी की कि नसबंदी के बाद कुत्तों को वापस गलियों में न छोड़ कर शेल्टर होम में रखा जाए, तब दुर्ग निगम की पोल खुलकर सामने आ गई। ​निगम के पास ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जहां सैकड़ों की तादाद में कुत्तों को रखा जा सके, उन्हें खाना दिया जा सके या बीमार और हिंसक कुत्तों को क्वारंटाइन (अलग) किया जा सके।

1 / 1

1.